Hindu Succession Act 1956 in Hindi - हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956

 

No: 30, Dated: Jun, 17 1956

 

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956

( 1956 का अधिनियम संख्यांक 30 ) [17 जून, 1956]

 

अध्याय 1

प्रारम्भिक 

 

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-

      (1) यह अधिनियम हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 कहा जा सकेगा |

      (2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है।

 

2. अधिनियम का लागू होना -

(1) यह अधिनियम लागू है -

(क) ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो हिन्दू धर्म के किसी भी रूप या विकास के अनुसार, जिसके अन्तर्गत वीरशैव, लिंगायत अथवा ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज या आर्य समाज के अनुयायी भी आते हैं, धर्मत: हिन्दू हो;

(ख) ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो धर्मत: बौद्ध, जैन या सिक्ख हो; तथा

(ग) ऐसे किसी भी अन्य व्यक्ति को जो धर्मत: मुस्लिम, क्रिश्चियन, पारसी या यहूदी न हो, जब तक कि यह साबित न कर दिया जाय कि यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो ऐसा कोई भी व्यक्ति एतस्मिन् उपबन्धित किसी भी बात के बारे में हिन्दू विधि या उस विधि के भाग-रूप किसी रूढ़ि या प्रथा द्वारा शासित न होता।

स्पष्टीकरण-

निम्नलिखित व्यक्ति धर्मत: यथास्थिति, हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख है:-

(क) कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता दोनों ही धर्मत: हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हों;

(ख) कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता में से कोई एक धर्मत: हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हो और जो उस जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुम्ब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका वह माता या पिता सदस्य है या था; 

(ग) कोई भी ऐसा व्यक्ति जो हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख धर्म में संपरिवर्तित या प्रतिसंपरिवर्तित हो गया हो।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसी जनजाति के सदस्यों को, जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खण्ड (25) के अर्थ के अन्तर्गत अनुसूचित जनजाति हो, लागू न होगी जब तक कि केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न कर दे।

(3) इस अधिनियम के किसी भी प्रभाग में आए हुए 'हिन्दू' पद का ऐसा अर्थ लगाया जाएगा मानों  उसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता हो जो यद्यपि धर्मत: हिन्दू नहीं है तथापि ऐसा व्यक्ति है जिसे यह अधिनियम इस धारा में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के आधार पर लागू होता है।

 

 

3. परिभाषाएं और निर्वचन-

(1) इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो

(क) 'गोत्रज 'एक व्यक्ति दूसरे का 'गोत्रज' कहा जाता है यदि वे दोनों केवल पुरुषों के माध्यम से रत या दत्तक द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित हों,

(ख) ‘आलियसन्तान विधि ”से वह विधि-पद्धति अभिप्रेत है जो ऐसे व्यक्ति को लागू है जो यदि यह अधिनियम पारित न किया गया हो तो मद्रास अलियसन्तान ऐक्ट, 1949 (मद्रास ऐक्ट 1949 का 9) द्वारा या रूढ़िगत अलियसन्तान विधि द्वारा उन विषयों के बारे में शासित होता जिनके लिए इस अधिनियम में उपबन्ध किया गया है;

(ग) ‘बन्धु' एक व्यक्ति दूसरे का 'बन्धु" कहा जाता है यदि वे दोनों रक्त या दत्तक द्वारा एक-दूसरे से सम्बन्धित हों किन्तु केवल पुरुषों के माध्यम से नहीं,

(घ) ‘रूढ़ि ' और "प्रथा" पद ऐसे किसी भी नियम का संज्ञान कराते हैं जिसने दीर्घकाल तक निरन्तर और एकरूपता से अनुपालित किए जाने के कारण किसी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुम्ब के हिन्दुओं में विधि का बल अभिप्राप्त कर लिया हो :

परन्तु यह तब जब कि नियम निश्चित हो और अयुक्तियुक्त या लोक नीति के विरुद्ध न हो :

तथा परन्तु यह और भी कि ऐसे नियम की दशा में जो एक कुटुम्ब को ही लागू हो, उसकी निरन्तरता उस कुटुम्ब द्वारा बन्द न कर दी गई हो;

(ड०) "पूर्णरक्त", "अर्धरक्त" और "एकोदररक्त" - 

  (i) कोई भी दो व्यक्ति एक-दूसरे से पूर्ण रक्त द्वारा सम्बन्धित कहे जाते हैं जबकि वे एक ही पूर्वज से उसकी एक ही पत्नी द्वारा अवजनित हुए हों, और अर्धरक्त द्वारा  सम्बन्धित कहे जाते हैं जबकि वे एक ही पूर्वज से किन्तु उसकी भिन्न पत्नियों द्वारा अवजनित हुए हों,

 (ii) दो व्यक्ति एक-दूसरे से एकोदररक्त  द्वारा सम्बन्धित कहे जाते हैं जबकि वे एक ही पूर्वजा से किन्तु उसके भिन्न पतियों से अवजनित हुए हों,

स्पष्टीकरण - इस खण्ड में "पूर्वज" पद के अन्तर्गत पिता आता है और "पूर्वजा" के अन्तर्गत माता आती है;

(च) ‘वारिस ” से ऐसा कोई भी व्यक्ति अभिप्रेत है चाहे वह पुरुष हो, या नारी, जो निर्वसीयत की सम्पति का उत्तराधिकारी होने का इस अधिनियम के अधीन हकदार है;

(छ) "निर्वसीयत" कोई  व्यक्ति चाहे पुरुष हो या नारी, जिसने किसी सम्पति के बारे में ऐसा वसीयती व्ययन न किया हो जो प्रभावशील होने योग्य हो, वह उस सम्पति के विषय में निर्वसीयत मरा समझा जाता है; 

(ज) ‘मरुमक्कतायम विधि” से विधि की वह पद्धति अभिप्रेत है जो उन व्यक्तियों को लागू है

  (क) जो यदि यह अधिनियम पारित न हुआ होता तो मद्रास मरुमक्कत्तायम ऐक्ट, 1932 (मद्रास अधिनियम 1933 का 22), ट्रावन्कोर नायर ऐक्ट (1100-के का 2), ट्रावन्कोर ईषवा ऐक्ट (1100-के का 3), ट्रावन्कोर नान्जिनाड वेल्लाल ऐक्ट (1101-के का 6), ट्रावन्कोर क्षेत्रीय ऐक्ट (1108-के का 7), ट्रावन्कोर कृष्णवका मरुमक्कतायी ऐक्ट (1115-के का 7), कोचीन मरुमक्कतायम् ऐक्ट (1113-के का 33), या कोचीन नायर ऐक्ट (1113-के का 29) द्वारा उन विषयों के बारे में शासित होते जिनके लिए इस अधिनियम द्वारा उपबन्ध किया गया है; अथवा

  (ख) जो ऐसे समुदाय के हैं जिसके सदस्य अधिकतर तिरुवांकुर कोचीन या मद्रास राज्य में, जैसा कि वह पहली नवम्बर, 1956 के अव्यवहित पूर्व अस्तित्व में था, अधिवासी हैं और यदि यह अधिनियम पारित न हुआ होता तो जो उन विषयों के बारे में जिनके लिए इस अधिनियम द्वारा उपबन्ध किया गया है विरासत की ऐसी पद्धति द्वारा शासित होते जिसमें नारी परम्परा के माध्यम से अवजनन गिना जाता है;

किन्तु इसके अन्तर्गत अलियसन्तान विधि नहीं आती;

(झ) ‘नंबूदिरी विधि” से विधि की वह पद्धति अभिप्रेत है जो उन व्यक्तियों को लागू है जो यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो मद्रास नंबूदिरी ऐक्ट, 1932 (मद्रास अधिनियम 1933 का 21), कोचीन नम्बूदिरी ऐक्ट (1113-के का 17), या ट्रावन्कोर मलायल्ल ब्राह्मण ऐक्ट (1106-के का 3), द्वारा उन विषयों के बारे में शासित होते जिनके लिए इस अधिनियम में उपबन्ध किया गया है;

(ज) ‘सम्बन्धित 'से अभिप्रेत है, धर्मज द्वारा सम्बन्धित :

परन्तु अधर्मज अपत्य अपनी माता से परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित समझे जाएंगे और उनके धर्मज वंशज उनसे और परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धित समझे जाएंगे और किसी भी ऐसे शब्द का जो सम्बन्ध को अभिव्यक्त करे या संबंधी को घोषित करे तदनुसार अर्थ लगाया जायगा।

(2) इस अधिनियम में जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, पुल्लिंग संकेत करने वाले शब्दों के अन्तर्गत नारियां न समझी जाएंगी।

 

4. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव —

(1) इस अधिनियम में अभिव्यक्ततः उपबन्धित के सिवाय— 

(क) हिन्दू विधि का कोई ऐसा शास्त्र-वाक्य, नियम या निर्वचन या उस विधि की भागरूप कोई भी रूढ़ि या प्रथा, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के अव्यवहित पूर्व प्रवृत्त रही हो, ऐसे किसी भी विषय के बारे में, जिसके लिए इस अधिनियम में उपबन्ध किया गया है, प्रभावहीन हो जाएगी,

(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ के अव्यवहित पूर्व प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि का हिन्दुओं को लागू होना वहाँ तक बन्द हो जाएगा जहां तक कि वह इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट उपबन्धों में से किसी से भी असंगत हो।

1[(2)  * * * ]

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1. 2005 के अधिनियम संख्या 39 की धारा 6 द्वारा (9.9.2005 से) विलुप्त।

अध्याय 2

निर्वसीयती उत्तराधिकार 

साधारण

 

5. अधिनियम का कुछ सम्पत्तियों को लागू न होना -  यह अधिनियम निम्नलिखित को लागू न होगा — 

(i) ऐसी किसी सम्पत्ति की जिसके लिए उत्तराधिकार, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 का 43) की धारा 21 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के कारण भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) द्वारा विनियमित होता है;

(ii) ऐसी किसी सम्पदा को जो किसी देशी राज्य के शासक द्वारा भारत सरकार से की गई किसी प्रसंविदा या करार के निबन्धनों द्वारा इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व पारित किसी अधिनियमिति के निबन्धनों द्वारा किसी एकल वारिस को अवजनित हुई है;

(iii) वलियम्ग थम्पूरन कोविलागम् सम्पदा और पैलेस फण्ड को जो कि महाराजा कोचीन द्वारा 29 जून, 1949 को प्रख्यापित उद्घोषणा (1124-के का 9) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर पैलेस एडमिनिस्ट्रेिशन बोर्ड द्वारा प्रशासित है। 

 

1[6. सहदायिकी सम्पत्ति में के हित का न्यागमन -

(1) हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ पर और से, मिताक्षरा विधि द्वारा शासित संयुक्त हिन्दू परिवार में, सहदायिक की पुत्री —

(क) जन्म से उसी ढंग में अपने अधिकार में सहदायिक होगी, जैसे पुत्र,

(ख) को सहदायिकी सम्पति में वही अधिकार होगा, जैसा उसे होता, यदि वह पुत्र होता,

(ग) उक्त सहदायिकी सम्पति के सम्बन्ध में उन्हीं दायित्वों के अध्यधीन होगी, जैसे पुत्र का दायित्व है।

और हिन्दू मिताक्षरा सहदायिक का कोई निदेश सहदायिक की पुत्री के निर्देश को शामिल करने वाल माना जायेगा :

परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई चीज सम्पति के किसी विभाजन या वसीयती विन्यास को, जो दिसम्बर, 2004 के 20वें दिन के पूर्व किया गया है, शामिल करके किसी विन्यास या अन्य संक्रमण को प्रभावित नहीं करेगी या अविधिमान्य नहीं बनायेगी।

(2) कोई सम्पति, जिसमें महिला हिन्दू उपधारा (1) के परिणामस्वरूप हकदार होती है, उसके द्वारा सहदायिकी स्वामित्व की घटना के साथ धारण की जायेगी और इस अधिनियम या तत्समय प्रवर्तित किस अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी चीज के होते हुये भी वसीयती विन्यास द्वारा उसके द्वारा व्ययन करने योग्र सम्पति मानी जायेगी।

(3) जहाँ हिन्दू की मृत्यु हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के बाद होती है वहाँ मिताक्षरा विधि द्वारा शासित संयुक्त हिन्दू परिवार की सम्पत्ति में उसका हित इस अधिनियम के अधीन वसीयती या निवसीयती उत्तराधिकार द्वारा, यथास्थिति, निगमित होगा औ उत्तरजीविता के द्वारा नहीं; और सहदायिकी सम्पति विभाजित की गयी मानी जायेगी, मानों विभाजन् हुआ था और, -

(क) पुत्री को वही अंश आवंटित किया जाता है, जो पुत्र को आवंटित किया जाता है,

(ख) पूर्व मृत पुत्र या पूर्व मृत पुत्री का अंश, जिसे वे प्राप्त करते, यदि वे विभाजन के समय जीवित् रहते, ऐसे पूर्व मृत पुत्र के या ऐसे पूर्व मृत पुत्री के उत्तरजीवी सन्तान को आवंटित किय जायेगा, और

(ग) पूर्व मृत पुत्र के या पूर्व मृत पुत्री के पूर्व मृत सन्तान का अंश, जिसे ऐसी सन्तान प्राप्त करता, यदि वह विभाजन के समय जीवित रहता या रहती, पूर्व मृत पुत्र या पूर्व मृत पुत्री के, यथास्थिति, के पूर्व मृत सन्तान की सन्तान को आवंटित किया जायेगा।

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1, 2005 के अधिनियम संख्या 39 की धारा 6 द्वारा (9.9.2005 से) प्रतिस्थापित।

 

स्पष्टीकरण - इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये हिन्दू मिताक्षरा सहदायिक का हित सम्पत्तिमें वह अंश समझा जायेगा जो उसे विभाजन में मिलता, यदि उसकी अपनी मृत्यु में अव्यवहित पूर्व सम्पत्ति का विभाजन किया गया होता इस बात का विचार किये बिना कि वह विभाजन का दावा करने का हकदार था या नहीं।

(4) हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के बाद, कोई न्यायालय पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध उसके पिता, पितामह-प्रपितामह से किसी बकाया ऋण की वसूली के लिये एकमात्र हिन्दू विधि के अधीन पवित्र कर्तव्य के आधार पर किसी ऐसे ऋण का उन्मोचन करने के लिए ऐसे पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के हिन्दू विधि के अधीन पवित्र आबद्धता के आधार पर कार्यवाही करने के किसी अधिकार को मान्यता नहीं देगा :

परन्तु हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के पूर्व लिये गये किसी ऋण के मामले में इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई चीज - 

(क) पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध, यथास्थिति, कार्यवाही करने के लिये किसी लेनदार के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा, या

(ख) किसी ऐसे ऋण के सम्बन्ध में या ऋण की तुष्टि में किये गये किसी अन्य संक्रमण को प्रभावित नहीं करेगा और कोई ऐसा अधिकार या अन्य संक्रमण उसी ढंग में और उसी विस्तार तक पवित्र कर्तव्य के नियम के अधीन प्रवर्तनीय होगा, जैसे यह प्रवर्तनीय होता, मानों हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 प्रवर्तित किया गया है।

स्पष्टीकरण - खण्ड (ख) के प्रयोजनों के लिये अभिव्यक्ति 'पुत्र', 'पौत्र' या 'प्रपौत्र' को पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र को, यथास्थिति निर्दिष्ट करने वाला माना जायेगा, जिसे हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ पूर्व जन्मा था या दत्तक लिया गया था।

(5) इस धारा में अंतर्विष्ट कोई चीज उस विभाजन को लागू नहीं होगी, जो दिसम्बर, 2004 के 20वें दिन के पूर्व हुआ था।

स्पष्टीकरण - इस धारा के प्रयोजनों के लिये 'विभाजन' से रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन सम्यक् से पंजीकृत विभाजन विलेख के निष्पादन द्वारा किया गया कोई विभाजन, न्यायालय के डिक्री द्वारा किया गया विभाजन अभिप्रेत है।]

 

Comments

 

विवाहित पुत्री का सहदायिकी (Coparcenary) सम्पत्ति में अधिकार - अधिनियम, 1956 की धारा 6 के अनुसार विवाहित पुत्रियां सहदायिकी सम्पति में अपने जन्म के द्वारा सहदायिकी सम्पति में समान अधिकार प्राप्त  करेंगी |  SMT. LEELABAI WD/O DAGDUBA HINGNE AND 3 ORS Vs SAU. BHIKABAI SHRIRAM PAKHARE. Bombay High Court - Judgment Date: Mar 28, 2014 ]

 

हिस्से की हकदारी (Entitlement) - हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के पश्चात् विवाहित पुत्रियां सम्पत्ति में आधे हिस्से की हकदार होगी। SMT. LEELABAI WD/O DAGDUBA HINGNE AND 3 ORS Vs SAU. BHIKABAI SHRIRAM PAKHARE. Bombay High Court - Judgment Date: Mar 28, 2014 ]

 

दावे की पोषणीयता (Maintainability) - यदि विवादास्पद सम्पत्ति निजी  सम्पति थी, तब उस सम्पति के विभाजन के लिए पौत्र का इस आधार पर दावा कि वह पैतृक थी, पोषणीय नहीं था। [ SUSHANT Vs. SUNDER SHYAM SINGH. - Delhi High Court. Judgment Date: Nov 07, 2013 ]

 

सम्पत्ति का अंतरण — यदि विवादास्पद सम्पत्ति निजी सम्पत्ति थी, तो यह मृतक पिता के पुत्र पर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् उसकी वैयक्तिक क्षमता में हस्तांतरित नहीं होगी। SUSHANT Vs. SUNDER SHYAM SINGH. - Delhi High Court. Judgment Date: Nov 07, 2013 ] 

 

विवादास्पद सम्पत्ति का अंतरण — सम्पत्ति के स्वामी की  मृत्यु के पश्चात् विवादास्पद सम्पत्ति अधिनियम, 1956 की धारा 6 के अनुसार उत्तराधिकार (Succession) द्वारा न कि उत्तरजीविता (Survival) द्वारा अंतरित होगी | PARESH DAMODARDAS MAHANT Vs ARUN DAMODARDAS MAHANT AND 3 ORS. Bombay High Court - Oct. 13, 2014 ]

 

सम्पत्ति के प्रशासन के लिए वाद दाखिल करने की अवधिकाल - मृतका पिता की सम्पत्ति के प्रशासन के लिए वाद पिता की मृत्यु के दिनांक से तीन वर्ष के भीतर दाखिल कर सकती है।  PARESH DAMODARDAS MAHANT Vs ARUN DAMODARDAS MAHANT AND 3 ORS. Bombay High Court - Oct. 13, 2014 ]

 

सम्पति का दावा करने हेतु वाद प्रस्तुत करने का अधिकार - विवादास्पद सम्पत्ति का दावा करने के लिए किसी वारिस तथा विधिक प्रतिनिधि का वाद प्रस्तुत करने का अधिकार पिता की मृत्यु के दिनांक पर प्राप्त होगा।  PARESH DAMODARDAS MAHANT Vs ARUN DAMODARDAS MAHANT AND 3 ORS. Bombay High Court - Oct. 13, 2014 ]

 

अंतरण की पूर्णता— विवादास्पद सम्पत्ति का हस्तान्तरण पिता की मृत्यु पर पूर्ण होगा। PARESH DAMODARDAS MAHANT Vs ARUN DAMODARDAS MAHANT AND 3 ORS. Bombay High Court - Oct. 13, 2014 ]

 

 

7. तरवाड, तावषि, कुटुम्ब, कबरु या इल्लम की सम्पत्ति में हित का न्यागमन -

 

(1) जबकि कोई हिन्दू जिसे यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो मरुमक्कत्तायम् या नंबूदिरी विधि लागू होती इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् अपनी मृत्यु के समय, यथास्थिति, तरवाड, तावषि या इल्लम् की सम्पति में हित रखते हुए मरे तब सम्पत्ति में उसका हित इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, वसीयती या निर्वसीयती उतराधिकार द्वारा न्यागत होगा, मरुमक्कत्तायम् या नंबूदिरी विधि के अनुसार नहीं।

स्पष्टीकरण - इस उपधारा के प्रयोजन के लिए तरवाड, तावषि या इल्लम् की सम्पति में हिन्दू का हित, यथास्थिति, तरवाड, तावषि या इल्लम् की सम्पत्ति में वह अंश समझा जाएगा जो उसे मिलता यदि उसकी अपनी मृत्यु के अव्यवहित पूर्व, यथास्थिति, तरवाड, तावषि या इल्लम् के उस समय जीवित सब सदस्यों में उस सम्पत्ति का विभाजन व्यक्तिवार हुआ होता, चाहे वह अपने को लागू मरुमक्कतायम् या नंबूदिरी विधि के अधीन ऐसे विभाजन का दावा करने का हकदार था या नहीं तथा ऐसा अंश उसे बांट में आत्यंतिकत: दे दिया गया समझा जाएगा।

(2) जबकि कोई हिन्दू, जिसे यदि वह अधिनियम पारित न किया गया होता तो अलियसन्तान विधि लागू होती इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् अपनी मृत्यु के समय, यथास्थिति, कुटुम्ब या कवरू की सम्पत्ति में अविभक्त हित रखते हुए मरे तब सम्पति में उसका अपना हित इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, वसीयती, या निर्वसीयती उत्तराधिकार द्वारा न्यागत होगा, अलियसन्तान विधि के अनुसार नहीं।

स्पष्टीकरण - इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए कुटुम्ब या कवरु की सम्पति में हिन्दू का हित, यथास्थिति, कुटुम्ब या कवरु की सम्पति में अंश समझा जाएगा जो उसे मिलता यदि उसकी अपनी मृत्यु के अव्यवहित पूर्व, यथास्थिति, कुटुम्ब या कवरु के उस समय जीवित सब सदस्यों में उस सम्पति का विभाजन व्यक्तिवार हुआ होता, चाहे वह अलियसन्तान विधि के अधीन ऐसे विभाजन का दावा करने का हकदार था या नहीं तथा ऐसा अंश उसे बाँट में आत्यंतिकत: दे दिया गया समझा जाएगा।

(3) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जबकि इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् कोई स्थानम्दार मरे तब उसके द्वारा धारित स्थानम् सम्पत्ति उस कुटुम्ब के सदस्यों की जिसका वह स्थानम्दार है और स्थानम्दार के वारिसों को ऐसे न्यागत होगी मानो स्थानम् सम्पत्ति स्थानम्दार और उसके उस समय जीवित कुटुम्ब के सब सदस्यों के बीच स्थानम्दार की मृत्यु के अव्यवहित पूर्व व्यक्तिवार तौर पर विभाजित कर दी गई थी और स्थानम्दार के कुटुम्ब के सदस्यों और स्थानम्दार के वारिसों को जो अंश मिले उन्हें वे अपनी पृथक् सम्पति के तौर पर धारित करेंगे।

स्पष्टीकरण - इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए स्थानम्दार के कुटुम्ब के अन्तर्गत उस कुटुम्ब की, चाहे विभक्त हो या अविभक्त, हर वह शाखा आएगी जिसके पुरुष सदस्य यदि अधिनियम पारित न किया गया होता तो किसी रूढ़ि या प्रथा के आधार पर स्थानम्दार के पद पर उत्तरवर्ती होने के हकदार होते। 

 

 

8. पुरुष की दशा में उत्तराधिकार के साधारण नियम -  निर्वसीयत मरने वाले हिन्दू पुरुष की सम्पत्ति इस अध्याय के उपबन्धों के अनुसार निम्नलिखित को न्यागत होगी :-

(क) प्रथमतः उन वारिसों को, जो अनुसूची के वर्ग 1 में विनिर्दिष्ट संबंधी हैं;

(ख) द्वितीयतः, यदि वर्ग 1 में वारिस न हो तो उन वारिसों को जो अनुसूची के वर्ग 2 में विनिर्दिष्ट संबंधी हैं:

(ग) तृतीयतः, यदि दोनों वर्गों में किसी में का कोई वारिस न हो तो मृतक के गोत्रजों को; तथा

(घ) अन्ततः, यदि कोई गोत्रज न हो तो मृतक के बन्धुओं को ।

 

9. अनुसूची में के वारिसों के बीच उत्तराधिकार का क्रम -- अनुसूची में विनिर्दिष्ट वारिसों में के वर्ग 1 में के वारिस एक साथ और अन्य सब वारिसों का अपवर्जन करते हुए अंशभागी होंगे; वर्ग 2 में की पहली प्रविष्टि में के वारिसों को दूसरी प्रविष्टि में के वारिसों की अपेक्षा अधिमान प्राप्त होगा; दूसरी प्रविष्टि में के वारिसों को तीसरी प्रविष्टि में के वारिसों की अपेक्षा अधिमान प्राप्त होगा और इसी प्रकार आगे क्रम से अधिमान प्राप्त होगा।

 

10. अनुसूची के वर्ग 1 में के वारिसों में सम्पत्ति का वितरण -- निर्वसीयत की संपत्ति अनुसूची के वर्ग 1 में के वारिसों में निम्नलिखित नियमों के अनुसार विभाजित की जाएगी :

नियम 1-- निर्वसीयत की विधवा को या यदि एक से अधिक विधवाएं हों तो सब विधवाओं को मिलाकर एक अंश मिलेगा।

नियम 2 -- निर्वसीयत के उत्तरजीवी पुत्रों और पुत्रियों और माता हर एक को एक-एक अंश मिलेगा।

नियम 3 -- निर्वसीयत के हर एक पूर्वमृत पुत्र की या हर एक पूर्वमृत पुत्री की शाखा में के सब वारिसों को मिलाकर एक अंश मिलेगा।

नियम 4 -- नियम 3 में निर्दिष्ट अंश का वितरण :

(i) पूर्वमृत पुत्र की शाखा में के वारिसों के बीच ऐसे किया जाएगा कि उसकी अपनी विधवा को या सब विधवाओं को मिलाकर और उत्तरजीवी पुत्रों और पुत्रियों को बराबर भाग प्राप्त हों, और उसके पूर्वमृत पुत्रों की शाखा को वही भाग प्राप्त हो;

(i) पूर्वमृत पुत्री की शाखा में के वारिसों के बीच ऐसे किया जाएगा कि उत्तरजीवी पुत्रों और पुत्रियों को बराबर भाग प्राप्त हों ।

 

11. अनुसूची के वर्ग 2 में के वारिसों में सम्पत्ति का वितरण -- अनुसूची के वर्ग 2 में किसी एक प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट वारिसों के बीच निर्वसीयत की सम्पत्ति ऐसे विभाजित की जाएगी कि उन्हें बराबर अंश मिले ।

 

12. गोत्रजों और बन्धुओं में उत्तराधिकार का क्रम -- गोत्रजों या बंधुओं में, यथास्थिति, उत्तराधिकार का क्रम यहां नीचे दिए हुए अधिमान के नियमों के अनुसार अवधारित किया जाएगा :

नियम 1-- दो वारिसों में से उसे अधिमान प्राप्त होगा जिसकी ऊपरली ओर की डिग्रियां अपेक्षातर कम हों या हों ही नहीं ।

नियम 2 -- जहां कि ऊपरली ओर की डिग्रियों की संख्या एक समान हों या हों ही नहीं उस वारिस को अधिमान प्राप्त होगा, जिसकी निचली ओर की डिग्रियां अपेक्षातर कम हों या हों ही नहीं ।

नियम 3 -- जहां कि नियम 1 या नियम 2 के अधीन कोई सा भी वारिस दूसरे से अधिमान का हकदार न हो वहां दोनों साथ-साथ अंशभागी होंगे।

 

13. डिग्रियों की संगणना –

(1) गोत्रजों या बन्धुओं के बीच उत्तराधिकार क्रम के अवधारण के प्रयोजन के लिए निर्वसीयत से, यथास्थिति, ऊपरली डिग्री या निचली डिग्री या दोनों के अनुसार वारिस के संबंध में संगणना की जाएगी।

(2) ऊपरली डिग्री और निचली डिग्री की संगणना निर्वसीयत को गिनते हुए की जाएगी ।

(3) हर पीढ़ी एक डिग्री गठित करती है चाहे ऊपरली चाहे निचली ।

 

14. हिन्दू नारी की संपत्ति उसकी आत्यन्तिकत: अपनी संपत्ति होगी –

(1) हिन्दू नारी के कब्जे में कोई भी संपत्ति, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या पश्चात् अर्जित की गई हो, उसके द्वारा पूर्ण स्वामी के तौर पर न कि परिसीमित स्वामी के तौर पर धारित की जाएगी।

स्पष्टीकरण -- इस उपधारा में “सम्पत्ति' के अन्तर्गत वह जंगम और स्थावर सम्पत्ति आती है जो हिन्दू नारी ने विरासत द्वारा अथवा वसीयत द्वारा अथवा विभाजन में अथवा भरण-पोषण के या भरणपोषण की बकाया के बदले में अथवा अपने विवाह के पूर्व या विवाह के समय या पश्चात् दान द्वारा किसी व्यक्ति से, चाहे वह संबंधी हो या न हो, अथवा अपने कौशल या परिश्रम द्वारा अथवा क्रय अथवा चिरभोग द्वारा अथवा किसी अन्य रीति से, चाहे वह कैसी ही क्यों न हों, अर्जित की हो और ऐसी कोई सम्पत्ति भी जो इस अधिनियम के प्रारंभ से अव्यवहित पूर्व स्त्रीधन के रूप में उसके द्वारा धारित थी ।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट कोई बात ऐसी किसी सम्पत्ति को लागू न होगी जो दान अथवा विल द्वारा या अन्य किसी लिखत के अधीन अथवा सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के अधीन या पंचाट के अधीन अर्जित की गई हो यदि दान, विल या अन्य लिखत अथवा डिक्री, आदेश या पंचाट के निबंधन ऐसी सम्पत्ति में निर्बन्धित सम्पदा विहित करते हों।

 

15. हिन्दू नारी की दशा में उत्तराधिकार के साधारण नियम --

(1) निर्वसीयत मरने वाली हिन्दू नारी की सम्पत्ति धारा 16 में दिए गए नियमों के अनुसार निम्नलिखित को न्यागत होगी :

(क) प्रथमतः, पुत्रों और पुत्रियों (जिसके अन्तर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री के अपत्य भी हैं) और पति को;

(ख) द्वितीयतः, पति के वारिसों को:

(ग) तृतीयतः, माता और पिता को;

(घ) चतुर्थतः, पिता के वारिसों को; तथा

(ङ) अन्ततः, माता के वारिसों को ।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी :

(क) कोई सम्पत्ति जिसकी विरासत हिन्दू नारी को अपने पिता या माता से प्राप्त हुई हो, मृतक के पुत्र या पुत्री के (जिसके अन्तर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री के अपत्य भी आते हैं) अभाव में उपधारा (1) में निर्दिष्ट अन्य वारिसों को उसमें विनिर्दिष्ट क्रम से न्यागत न होकर पिता के वारिसों को न्यागत होगी; तथा 

(ख) कोई संपत्ति जो हिन्दू नारी को अपने पति या अपने श्वसुर से विरासत में प्राप्त हुई हो मृतक के किसी पुत्र या पुत्री के (जिसके अन्तर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री के अपत्य भी आते हैं) अभाव में उपधारा (1) में निर्दिष्ट अन्य वारिसों को उसमें विनिर्दिष्ट क्रम से न्यागत न होकर पति के वारिसों को न्यागत होगी ।

 

16. हिन्दू नारी के वारिसों में उत्तराधिकार का क्रम और वितरण की रीति -- धारा 15 में निर्दिष्ट वारिसों में उत्तराधिकार का क्रम और उन वारिसों में निर्वसीयत की सम्पत्ति का वितरण निम्नलिखित नियमों के अनुसार होगा, अर्थात् :

नियम 1 -- धारा 15 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट वारिसों में से पहली प्रविष्टि में के वारिसों को किसी उत्तरवर्ती प्रविष्टि में के वारिसों की तुलना में अधिमान प्राप्त होगा और जो वारिस एक ही प्रविष्टि के अन्तर्गत हो, वे साथ-साथ अंशभागी होंगे।

नियम 2 -- यदि निर्वसीयत का कोई पुत्र या अपने ही कोई अपत्य निर्वसीयत की मृत्यु के समय जीवित छोड़कर निर्वसीयत से पूर्व मर जाए तो ऐसे पुत्र या पुत्री के अपत्य परस्पर वह अंश लेंगे जिसे वह लेती यदि निर्वसीयत की मृत्यु के समय ऐसा पुत्र या पुत्री जीवित होती ।

नियम 3 -- धारा 15 की उपधारा (1) के खण्ड (ख), (घ) और (ङ) में और उपधारा (2) में निर्दिष्ट वारिसों को निर्वसीयत की सम्पत्ति उसी क्रम में और उन्हीं नियमों के अनुसार न्यागत होगी जो लागू होते यदि सम्पत्ति, यथास्थिति, पिता की या माता की या पति की होती और वह व्यक्ति निर्वसीयत की मृत्यु के अव्यवहित पश्चात् उस सम्पत्ति के बारे में वसीयत किए बिना मर गया होता ।

 

17. मरुमक्कत्तायम और अलियसंतान विधियों द्वारा शासित व्यक्तियों के विषय में विशेष उपबंध --

धाराओं 8, 10, 15 और 23 के उपबंध उन व्यक्तियों के संबंध में जो यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो मरुमक्कत्तायम विधि या अलियसन्तान विधि द्वारा शासित होते, ऐसे प्रभावशील होंगे मानो

(i) धारा 8 के उपखण्डों (ग) और (घ) के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित कर दिया गया हो, अर्थात्

(ग) तृतीयत: यदि दोनों वर्गों में किसी का कोई वारिस न हो तो उसके संबंधियों को चाहे वे गोत्रज हों या बन्धु हो

(ii) धारा 15 की उपधारा (1) के खण्ड (क) से लेकर (ङ) तक के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित

कर दिया गया हो, अर्थात :

(क) प्रथमतः, पुत्रों और पुत्रियों को (जिनके अन्तर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री के अपत्य भी आते हैं) और माता को;

(ख) द्वितीयतः, पिता और पति को;

(ग) तृतीयतः, माता के वारिसों को;

(घ) चतुर्थतः, पिता के वारिसों को; तथा

(ङ) अन्तत: पति के वारिसों को ।

(iii) धारा 15 की उपधारा (2) को खण्ड (क) लुप्त कर दिया गया हो;

(iv) धारा 23 लुप्त कर दी गई हो ।

 

उत्तराधिकार से संबंधित साधारण उपबंध

 

18. पूर्णरक्त को अर्धरक्त पर अधिमान प्राप्त है -- निर्वसीयत से पूर्णरक्त सम्बन्ध रखने वाले वारिसों को अर्धरक्त सम्बन्ध रखने वाले वारिसों पर अधिमान प्राप्त होगा यदि उस सम्बन्ध की प्रकृति सब प्रकार से वही हो ।

 

19. दो या अधिक वारिसों के उत्तराधिकार का ढंग -- यदि दो या अधिक वारिस निर्वसीयत की संपत्ति के एक साथ उत्तराधिकारी होते हैं तो वे सम्पत्ति को निम्नलिखित प्रकार से पाएंगे :

(क) इस अधिनियम में अभिव्यक्त तौर पर अन्यथा उपबन्धित के सिवाय व्यक्तिवार, न कि शाखावार आधार पर लेंगे; और

(ख) सामान्यिक अभिधारियों की हैसियत में न कि संयुक्त अभिधारियों की हैसियत में लेंगे।

 

20. गर्भ स्थित अपत्य का अधिकार -- जो अपत्य निर्वसीयत की मृत्यु के समय गर्भ में स्थित था और जो तत्पश्चात् जीवित पैदा हुआ हो उसके निर्वसीयत की विरासत के विषय में वही अधिकार होंगे जो उसके होते यदि वह निर्वसीयत के मृत्यु के पूर्व पैदा हुआ होता, और ऐसी दशा में विरासत निर्वसीयत की मृत्यु की तारीख से उसमें निहित समझी जाएगी ।

 

21. सम-सामयिक मृत्युओं के विषय में उपधारणा -- जहां कि दो व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में मरे हों जिनमें यह अभिनिश्चित हो कि उनमें से कोई दूसरे का उत्तरजीवी रहा या नहीं और रहा तो कौन सा, वहाँ जब तक प्रतिकूल साबित न किया जाए, सम्पत्ति के उत्तराधिकार सम्बन्धी सब प्रयोजनों के लिए यह उपधारणा की जाएगी कि कनिष्ठ ज्येष्ठ का उत्तरजीवी रहा ।

 

22. कुछ दशाओं में सम्पत्ति अर्जित करने का अधिमानी अधिकार --

(1) जहां कि इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् निर्वसीयत की किसी स्थावर सम्पत्ति में या उसके द्वारा चाहे स्वयं या दूसरों के साथ किए जाने वाले किसी कारबार में के हित अनुसूची के वर्ग 1 में विनिर्दिष्ट दो या अधिक वारिसों को न्यागत हों और ऐसे वारिसों में से कोई उस सम्पत्ति या कारबार में अपने हित के अन्तरण की प्रस्थापना करे वहां ऐसे अन्तरित किए जाने के लिए प्रस्थापित हित को अर्जित करने का अधिमानी अधिकार दूसरे वारिसों को प्राप्त होगा।

(2) मृतक की सम्पत्ति में कोई हित जिस प्रतिफल के लिए इस धारा के अधीन अन्तरित किया जा सकेगा, वह पक्षकारों के बीच किसी करार के अभाव में इस निमित्त किए गए आवेदन पर न्यायालय द्वारा अवधारित किया जाएगा और यदि उस हित को अर्जित करने की प्रस्थापना करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे अवधारित प्रतिफल पर उसे अर्जित करने के लिये राजी न हो तो ऐसा व्यक्ति उस आवेदन के, या उससे अनुषंगिक सब खर्चे को देने का दायी होगा ।

(3) यदि इस धारा के अधीन किसी हित को अर्जित करने की प्रस्थापना करने वाले अनुसूची के वर्ग 1 में विनिर्दिष्ट दो या अधिक वारिस हों तो उस वारिस को अधिमान दिया जाएगा जो अन्तरण के लिए अधिकतम प्रतिफल देने की पेशकश करे ।

स्पष्टीकरण -- इस धारा में “न्यायालय” से वह न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता की सीमाओं के अन्दर वह स्थावर सम्पत्ति आस्थित है या कारबार किया जाता है और इसके अन्तर्गत ऐसा कोई अन्य न्यायालय भी आता है जिसे राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

 

23. निवास गृह के बारे में विशेष उपबन्ध -- हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 (2005 का 39), धारा 4 द्वारा विलोपित (दिनांक 9-9-2005 से प्रभावशील) ।

 

24. पुनर्विवाह करने वाली कुछ विधवा होने के नाते विरासत प्राप्त न कर सकेगी -- [हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 (2005 का 39), धारा 5 द्वारा विलोपित (दिनांक 9-9-2005 से प्रभावशील) ]

 

25. हत्या करने वाला निरहित होगा -- जो व्यक्ति हत्या करता है या हत्या करने का दुष्प्रेरण करता है वह हत-व्यक्ति की सम्पत्ति या ऐसी किसी अन्य सम्पत्ति को, जिसमें उत्तराधिकार को अग्रसर के लिये उसने हत्या की थी या हत्या करने का दुष्प्रेरण किया था, विरासत में पाने से निरर्हित होगा ।

 

26. संपरिवर्तितों के वंशज निरहित होंगे -- जहां कि कोई हिन्दू इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् धर्म-संपरिवर्तन के कारण हिन्दू न रह गया हो या न रहे वहां ऐसे संपरिवर्तन के पश्चात् पैदा हुए उसके अपत्य और उस अपत्य के वंशज अपने हिन्दू सम्बन्धियों में से किसी की सम्पत्ति को विरासत में प्राप्त करने से निरर्हित होंगे सिवाय जब कि ऐसे अपत्य या उस अपत्य के वंशज उस समय जबकि उत्तराधिकार खुले, हिन्दू हों ।

 

27. उत्तराधिकार जबकि वारिस निरर्हित हो -- यदि कोई व्यक्ति किसी सम्पत्ति को विरासत में पाने से इस अधिनियम के अधीन निरर्हित हो तो वह सम्पत्ति ऐसे न्यागत होगी मानो ऐसा व्यक्ति निर्वसीयत के पूर्व मर चुका हो ।

 

28. रोग, त्रुटि आदि से निरर्हता न होगी -- कोई व्यक्ति किसी सम्पत्ति का उत्तराधिकार पाने से किसी रोग, त्रुटि या अंगविकार के आधार पर या इस नियम में यथा उपबंधित को छोड़कर किसी भी अन्य आधार पर, चाहे वह कोई क्यों न हो, निरर्हित न होगा ।

 

राजगामित्व

 

29. वारिसों का अभाव -- यदि निर्वसीयत ऐसा कोई वारिस पीछे न छोड़े जो उसकी सम्पत्ति को इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार उत्तराधिकार में पाने के लिए अर्ह हो तो ऐसी सम्पत्ति सरकार को न्यागत होगी और सरकार ऐसी सम्पत्ति को उन सब बाध्यताओं और दायित्वों के अध्यधीन लेगी जिनके अध्यधीन वारिस होता ।

 

अध्याय 3

वसीयती उत्तराधिकारी

 

30. वसीयती उत्तराधिकारी -- कोई हिन्दू विल द्वारा या अन्य वसीयती व्ययन द्वारा भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) या हिन्दुओं को लागू और किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के अनुसार किसी ऐसी सम्पत्ति को व्ययनित कर सकेगा या कर सकेगी जिसका ऐसे व्ययनित किया जाना शक्य हो ।

स्पष्टीकरण -- मिताक्षरा सहदायिकी सम्पत्ति में हिन्दू पुरुष का हित या तरवाड, तावषि, इल्लम्, कुटुम्ब या कवरू की सम्पत्ति में तरवाड, तावषि, इल्लम्, कुटुम्ब या कवरू के सदस्य का हित इस अधिनियम में या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के होते हुए भी इस [धारा] के अर्थ के अन्दर ऐसी सम्पत्ति समझी जाएगी जिसका उस द्वारा व्ययनित किया जाना शक्य हो ।

 

अध्याय 4

निरसन

 

31. निरसन -- निरसन तथा संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 68) की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा (26-12-1960 से) निरसित ।

 

अनुसूची

(धारा 8 देखिए)

वर्ग 1 और वर्ग 2 में वारिस

वर्ग 1

पुत्र, पुत्री, विधवा, माता, पूर्वमृत पुत्र का पुत्र, पूर्वमृत पुत्र की पुत्री, पूर्वमृत पुत्री का पुत्र, पूर्वमृत पुत्री की पुत्री, पूर्वमृत पुत्र की विधवा, पूर्वमृत पुत्र के पूर्वमृत पुत्र का पुत्र, पूर्वमृत पुत्र के पूर्वमृत पुत्र की पुत्री, पूर्वमृत पुत्र के पूर्वमृत पुत्र की विधवा '[पूर्वमृत पुत्री की पूर्वमृत पुत्री का पुत्र, पूर्वमृत पुत्री की पूर्वमृत पुत्री की पुत्री; पूर्वमृत पुत्री के पूर्वमृत पुत्र की पुत्री; पूर्वमृत पुत्र की पूर्वमृत पुत्री की पुत्री] ।

 

वर्ग 2

 

i.पिता ।

II. (1) पुत्र की पुत्री का पुत्र, (2) पुत्र की पुत्री की पुत्री, (3) भाई, (4) बहिन |

Ill. (1) पुत्री के पुत्र का पुत्र, (2) पुत्री के पुत्र की पुत्री, (3) पुत्री की पुत्री का पुत्र, (4) पुत्री

की पुत्री की पुत्री

IV. (1) भाई का पुत्र (2) बहिन का पुत्र (3) भाई की पुत्री (4) बहिन की पुत्री ।

V. पिता का पिता, पिता की माता

VI. पिता की विधवा, भाई की विधवा

VII. पिता का भाई, पिता की बहिन

VIII. माता का पिता, माता की माता

IX. माता का भाई, माता की बहिन

स्पष्टीकरण -- इस अनुसूची में भाई या बहिन के प्रति निर्देशों के अन्तर्गत उस भाई या बहिन के प्रति निर्देश नहीं हैं जो केवल एकोदररक्त के हों।