नवजात बच्चों की नेत्र ज्योति के साथ जिंदगी भी होगी रौशन

Posted on 11 Feb, 2019 5:29 pm

भोपाल के शासकीय हमीदिया अस्पताल में नवजात शिशुओं को अंधत्व से बचाने के लिये रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मेच्योरिटी नेत्र जाँच और लेजर ट्रीटमेंट शुरू किया गया है। अब तक दो हजार से अधिक नवजात शिशु इसका लाभ उठा चुके हैं। गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय द्वारा हमीदिया अस्पताल में इसके लिये मंगलवार, गुरूवार और शनिवार को प्रात: 9 बजे से अपरान्ह 3 बजे तक ओपीडी संचालित की जा रही है, परन्तु भोपाल के बाहर से आने वाले बच्चों की रोज जाँच की जा रही है। ओपीडी में भोपाल और आसपास के गाँव-शहरों के रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मेच्योरिटी (आर.ओ.पी.) शिशु जाँच और उपचार के लिये आ रहे हैं। अक्सर देखा गया है कि समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों के आँख के पर्दे (रेटिना) पर आवांछित नसों का जाल विकसित हो जाता है। ये बच्चे को हमेशा के लिये अंधा बना देता है। लेजर से आवांछित नसों के विकास को खत्म कर दिया जाता है।

विभागाध्यक्ष डॉ. कविता कुमार ने बताया कि रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मेच्योरिटी अक्सर समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों में पायी जाती है। जिन बच्चों का वजन 1500 ग्राम से कम है, गर्भावस्था 32 हफ्ते या उससे कम है अथवा बच्चे को जन्म के बाद अधिक मात्रा में आक्सीजन की आवश्यकता पड़ी हो, आर.ओ.पी. का शिकार होते हैं। आर.ओ.पी. पीड़ित बच्चे अंधत्व, भेंगापन, रेटीना डिटेचमेंट, ग्लूकोमा और निकट दृष्टिदोष का शिकार होते हैं। इससे उनकी जिंदगी ही दुखभरी और संघर्षमय हो जाती है। अब जन्म लेने के बाद ही शिशु की आँख का परीक्षण किया जाता है। डॉ. कविता कुमार ने कहा कि कई बार जन्म लेने के कुछ हफ्ते तक नेत्र दोष पकड़ में नहीं आता। इसलिये समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों का नेत्र परीक्षण जन्‍म के चौथे से छठे हफ्ते के बीच अवश्य करवाना चाहिये। पहले कुछ हफ्ते बच्चे की आँख की निगरानी की जाती है। यदि दवा या प्राकृतिक रूप से यह दोष नियंत्रित हो जाता है, तो लेजर ट्रीटमेंट नहीं दिया जाता है। डॉ. कुमार ने कहा कि रोज 20-25 नवजात शिशुओं का नेत्र परीक्षण होता है, जिनमें चार-पाँच शिशु में उपचार की आवश्यकता होती है।

गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय की अधिष्ठाता डॉ. अरुणा कुमार द्वारा अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चों की आँखों का तुरंत परीक्षण करने के जारी निर्देश के तहत शासकीय अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चों का नेत्र विशेषज्ञ द्वारा नेत्र परीक्षण किया जाता है। जो बच्चे आर.ओ.पी. ग्रसित पाये जाते हैं, उनका उचित उपचार किया जाता है और आवश्यक होने पर लेजर ट्रीटमेंट दिया जाता है। गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय ने नेत्र विभाग के चिकित्सकों को आर.ओ.पी. पीड़ित बच्चों की जाँच और उपचार के लिये प्रशिक्षण देने के साथ सभी आवश्यक उपकरण भी प्रदान किये हैं। लेजर, वीडियो इनडायरेक्ट ऑप्थलमोस्कोप, इनडायरेक्ट ऑप्थलमोस्कोप आदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रदाय किये गये हैं।

मुंगावली की किरण, विदिशा की गायत्री, राजगढ़ जिले की शिवानी, होशंगबाद जिले के ग्राम नीमसरिया की निर्मला अपने 14 दिन से 27 दिन के शिशुओं के साथ चेकअप कराने आई हैं। भोपाल में कोलार की एक माता अपने शिशु को पाँचवी बार नेत्र जाँच के लिये लाई है। उसका कहना है कि मेरे बेटे का जन्म 7 माह में ही हो गया था, परन्तु डाक्टरों के सहयोग से अब यह सामान्य विकास की ओर है।

साभार – जनसम्पर्क विभाग मध्यप्रदेश​​

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