Updated: Apr, 17 2017

Section 20Presumption where public servant accepts gratification other than legal remuneration.-

(1) Where, in any trial of an offence punishable under section 7 or section 11 or clause (a) or clause (b) or sub- section (1) of section 13 it is proved that an accused person has accepted or obtained or has agreed to accept or attempted to obtain for himself, or for any other person, any gratification (other than legal remuneration) or any valuable thing from any person, it shall be presumed, unless the contrary is proved, that he accepted or obtained or agreed to accept or attempted to obtain that gratification or that valuable thing, as the case may be, as a motive or reward such as is mentioned in section 7 or, as the case may be, without consideration or for a consideration which he knows to be inadequate.

(2) Where in any trial of an offence punishable under section 12 or under clause (b) of section 14, it is proved that any gratification (other than legal remuneration) or any valuable thing has been given or offered to be given or attempted to be given by an accused person, it shall be presumed, unless the contrary is proved, that he gave or offered to give or attempted to give that gratification or that valuable thing, as the case may be, as a motive or reward such as is mentioned in section 7, or, as the case may be, without consideration or for a consideration which he knows to be inadequate.

(3) Notwithstanding anything contained in sub- sections (1) and (2), the court may decline to draw the presumption referred to in either of the said sub- sections, if the gratification or thing aforesaid is, in its opinion, so trivial that no inference of corruption may fairly be drawn. 

 

 

20. जहाँ लोक सेवक वैध पारिश्रमिक के भिन्न पारिश्रमिक ग्रहण करता है वहाँ उपधारणा –

(1) जहाँ धारा 7 या धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (क) या खंड (ख) के अधीन दंडनीय अपराधों के विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति ने, किसी व्यक्ति से वैध (वैध पारिश्रमिक से भिन्न) कोई परितोषण या कोई मूल्यवान वस्तु अपने लिए या किसी अन्य के लिए प्रतिग्रहीत या अभिप्राप्त की है या करने का प्रयत्न किया है या करने की सहमति दी है वहां जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए यह उपधारणा की जाएगी कि उसने यथास्थिति, उस परितोषण या मूल्यवान वस्तु को ऐसे हेतु या ईनाम के रूप में, जैसा कि धारा 7 में वर्णित है, जिसका अपर्याप्त होना वह जानता है, प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त किया है अथवा सहमत हुआ है या करने का प्रयत्न किया है।

(2) जहां धारा 12 या धारा 14 के खंड (ख) के अधीन दंडनीय किसी अपराध के किसी विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि अभियुक्त ने (वैध पारिश्रमिक से भिन्न) कोई पारितोषण या कोई मूल्यवान वस्तु दी हो या देने की स्थापना की हो या देने का प्रयत्न किया हो, वहाँ जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए यह उपधारणा की जाएगी कि उसने यथास्थिति, उस पारितोषण या मूल्यवान वस्तु को ऐसे ईनाम के रूप में जैसा कि धारा 7 में वर्णित है या, जैसी भी स्थिति हो प्रतिफल के बिना ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका अपर्याप्त होना वह जानता है दिया है, देने की प्रस्थापना की है, या देने का प्रयत्न किया है।

(3) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी न्यायालय उक्त अपराधों में निर्दिष्ट उपधारणा करने से इंकार कर सकेगा यदि पूर्वोक्त पारितोषण या वस्तु, उसकी राय में इतनी तुच्छ है कि भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष उचित रूप से नहीं निकाला जा सकता है।

 

 

COMMENTARY AND CASE LAWS-

  1.  Presumption permissible to be drawn under Section 20  in respect of the offence under Section 7 and not the offences under Section 13(1)(d)(i)(ii) of the Act- [B. JAYARAJ VERSUS STATE OF A.P.:MARCH 28, 2014- Supreme Court has held that " In so far as the presumption permissible to be drawn under Section 20 of the Act is concerned, such presumption can only be in respect of the offence under Section 7 and not the offences under Section 13(1)(d)(i)(ii) of the Act. In any event, it is only on proof of acceptance of illegal gratification that presumption can be drawn under Section 20 of the Act that such gratification was received for doing or forbearing to do any official act. Proof of acceptance of illegal gratification can follow only if there is proof of demand."