Updated: Apr, 17 2017

Section 22The Code of Criminal Procedure, 1973 , to apply subject certain modifications.-

The provisions of the Code of Criminal Procedure, 1973 (2 of 1974 .), shall in their application to any proceeding in relation to an offence punishable under this Act have effect as if,--

(a) in sub- section (1) of section 243, for the words" The accused shall then be called upon", the words" The accused shall then be required to give in writing at once or within such time as the Court may allow, a list of the persons (if any) whom he proposes to examine as his witnesses and of the documents (if any) on which he proposes to rely and he shall then be called upon" had been substituted;

(b) in sub- section (2) of section 309, after the third proviso, the following proviso had been inserted, namely:--" Provided also that the proceeding shall not be adjourned or postponed merely on the ground that an application under section 397 has been made by a party to the proceeding.";

(c) after sub- section (2) of section 317, the following sub- section had been inserted, namely:--" (3) Notwithstanding anything contained in sub- section (1) or section (2), the Judge may, if he thinks fit and for reasons to be recorded by him, proceed with inquiry or trial in the absence of the accused or his pleader and record the evidence of any witness subject to the right of the accused to recall the witness for cross- examination.';

(d) in sub- section (1) of section 397, before the Explanation, the following proviso had been inserted, namely:--" Provided that where the powers under this section are exercised by a Court on an application made by a party to such proceedings, the Court shall not ordinarily call for the record of the proceedings:--

(a) without giving the other party an opportunity of showing cause why the record should not be called for; or

(b) if it is satisfied that an examination of the record of the proceedings may be made from the certified copies.". 

 

 

22. दंड प्रकिया संहिता, 1973 का कुछ उपांतरो के अध्यधीन लागू होना -

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के संबंध में अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध के संबंध में किसी कार्य प्रभावी होने से ऐसे प्रभावी होंगे मानों --

(क) धारा 243 की उपधारा (1) में ‘तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी” शब्दों के लिए ‘तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी कि वह तुरन्त या इतने समय के भीतर जितना न्यायालय अनुज्ञात करे, उन व्यक्तियों की (यदि कोई हो) जिनकी वह अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा करना चाहता है, एक लिखित सूची दे, और तब उससे अपेक्षा की जाएगी", शब्द स्थापित कर दिए गए हों,

(ख) धारा 309 की उपधारा (2) के तीसरे परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक अन्त:स्थापित कर

दिया गया हो, यथा :-

‘परन्तु यह भी कि कार्यवाही को केवल इस आधार पर स्थगित या मुल्तवी नहीं किया जाएगा कि कार्यवाही के एक पक्षकार द्वारा धारा 397 के अधीन आवेदन दिया है”;

(ग) धारा 317 की उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अन्त:स्थापित कर दी गई हो,

यथा :- ‘(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी बात के होते हुए भी न्यायाधीश यदि वह ठीक समझता है तो, उसके द्वारा अभिलिखित किए जाने वाले कारणों के लिए अभियुक्त या उसके अभिभाषक की अनुपस्थिति में जांच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकेगा और किसी साक्षी के प्रति साक्ष्य की परीक्षा के लिए उस साक्षी को पुनः बुलाने के लिए अभियुक्त के अधिकार के अध्यधीन अभिलिखित कर सकेगा';

(घ) धारा 379 की उपधारा (1) में स्पष्टीकरण के पहले निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित कर दिया

गया हो, अर्थात् :-

‘परन्तु जहां किसी न्यायालय द्वारा इस धारा के अधीन शक्तियों का प्रयोग ऐसी कार्यवाहियों के किसी एक पक्षकार द्वारा किए गए आवेदन पर किया जाता हो वहां न्यायालय कार्यवाही के अभिलेख को मामूली तौर पर :-

(क) दूसरे पक्षकार को इस बात का हेतुक दर्शित करने का अवसर दिए बिना नहीं मंगायेगा कि अभिलेख क्यों न मंगाया जाए, या

(ख) उस दशा में नहीं मंगायेगा जिसमें उसका समाधान हो जाता है कि कार्यवाही के अभिलेख की प्रमाणित प्रतियों से उसकी परीक्षा की जा सकती है।