Pooling of Gas in Fertilizer (Urea) Sector

 

No: --- Dated: Mar, 31 2015

The Cabinet Committee on Economic Affairs, chaired by the Prime Minister Shri Narendra Modi, has approved a major policy intervention, to supply gas at uniform delivered price to all fertilizer plants on the gas grid for production of urea through a pooling mechanism. 

It is expected that the cost of production of urea at pooled price would be less than the price of imported urea, which will encourage the existing urea units to produce beyond their reassessed capacity. The increase in urea manufacturing capacity will also contribute to the Make in India initiative. 

This reform measure is also expected to augment indigenous manufacturing capacities. It is expected to help in reviving the Gorakhpur, Barauni and Sindri urea plants. These three urea plants will serve as the anchor load customers for Jagdishpur Haldia pipeline. As a result, work on this pipeline which was approved in 2007 is expected to start in this financial year. 

The Department of Fertilizer (DOF) has estimated that today’s decision will lead to additional production of around 37.13 Lakh MT of urea in existing fertilizers units over the next four years (i.e., 2015-16 to 2018-19). This will reduce import dependence to this extent and result in saving of Rs. 1550 crore of subsidy. At present, there are 30 urea producing units in the country, out of which 27 units are gas based and three units viz Mangalore Chemicals & Fertilizers Limited (MCFL), Madras Fertilizers Limited (MFL) and Southern Petrochemicals Industries Limited (SPIC) are Naphtha based. Out of the total consumption of about 30 Million Metric Tonne Per Annum (MMTPA) of urea, about 23 MMTPA of Urea is currently produced in the country. In addition to domestic production of Urea, around 2 MMTPA is imported from Oman under the Urea Off-Take Agreement (UOTA) which will continue upto 2020. The shortfall of about 5 MMTPA Urea is being met through imports. Urea demand during 2017-18 is projected to be about 34 MMTPA and by 2024-25, it is expected to be 38 MMTPA. Hence, in absence of new capacity addition in the country, urea imports would have increased. 

Further, DOF has estimated the saving in subsidy outgo due to revised energy norms of urea units of Rs. 6979 crore during the next four years.( i.e. 2015-16 to 2018-19). 

Background: 

The need for this intervention arose because, at present, the price of gas supplied to fertilizer units varies from plant to plant depending upon the combination of domestic gas and Regasified Liquefied Natural Gas (RLNG). Hence, there is no uniformity in input price. Further, there is wide variation in the conversion efficiency of plants measured in Gcal/MT. As the variation in final urea production cost is a result of variation in two factors (gas price and conversion efficiency), it is necessary to separate the two effects. A uniform gas price at the input stage will achieve this objective and will help focus on improving plant efficiency. 

 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में आर्थिक मामलों पर कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने संयोजन (पूलिंग) व्‍यवस्‍था के जरिए यूरिया के उत्‍पादन के लिए गैस ग्रिड पर सभी उर्वरक संयंत्रों को एकसमान वितरित मूल्‍य पर गैस की आपूर्ति करने के लिए एक नीतिगत पहल को मंजूरी दी है।

यह उम्‍मीद की जा रही है कि संयोजित (पूल्‍ड) मूल्‍य पर यूरिया की उत्‍पादन लागत आयातित यूरिया की कीमत से कम बैठेगी, जिससे मौजूदा यूरिया इकाइयां अपनी पुनर्आकलित क्षमता से कहीं ज्‍यादा उत्‍पादन करने के लिए प्रोत्‍साहित होंगी। यूरिया उत्‍पादन क्षमता में यह बढ़ोतरी 'मेक इन इंडिया' पहल में भी अहम योगदान करेगी।

इस महत्‍वपूर्ण सुधार से स्‍वदेशी उत्‍पादन क्षमताओं में भी काफी वृद्धि होने की आशा है। इस कदम से गोरखपुर, बरौनी और सिंदरी यूरिया संयंत्रों के पुनरुद्धार में मदद मिलने की उम्‍मीद है। ये तीनों यूरिया संयंत्र जगदीशपुर-हल्दिया पाइपलाइन के लिए भरोसेमंद भार ग्राहकों के रूप में अपनी सेवायें प्रदान करेंगे। इसके परिणामस्‍वरूप इस पाइपलाइन पर काम चालू वित्‍त वर्ष में ही शुरू हो जाने की आशा है। इस पाइपलाइन को वर्ष 2007 में मंजूरी दी गई थी।

उर्वरक विभाग (डीओएफ) ने अनुमान व्‍यक्‍त किया है कि आज के निर्णय से अगले चार वर्षों के दौरान (2015-16 से लेकर 2018-19 तक) मौजूदा उर्वरक इकाइयों में तकरीबन 37.13 लाख मीट्रिक टन यूरिया का अतिरिक्‍त उत्‍पादन होगा। इससे आयात पर निर्भरता भी इसी हद तक घट जायेगी और 1550 करोड़ रुपये की सब्सिडी की बचत होगी। मौजूदा समय में देश भर में 30 यूरिया उत्‍पादक इकाइयां हैं, जिनमें से 27 इकाइयां गैस आधारित और 3 इकाइयां मंगलोर केमिकल्‍स एण्‍ड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एमसीएफएल), मद्रास फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एमएफएल) और सदर्न पेट्रोकेमिकल्‍स इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड (एसपीआईसी) नाफ्था आधारित हैं। यूरिया की तकरीबन 30 एमएमटीपीए (मिलियन मीट्रिक टन सालाना) की कुल खपत में से लगभग 23 एमएमटीपीए यूरिया का उत्‍पादन फिलहाल देश में होता है। यूरिया के घरेलू उत्‍पादन के अलावा तकरीबन 2 एमएमटीपीए यूरिया का आयात ओमान से यूरिया खरीद करार (यूओटीए) के तहत होता है, जो वर्ष 2020 तक जारी रहेगा। तकरीबन 5 एमएमटीपीए यूरिया की जो कमी पड़ रही है, उसकी पूर्ति आयात के जरिए की जा रही है। वर्ष 2017-18 के दौरान यूरिया की मांग तकरीबन 34 एमएमटीपीए रहने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2024-25 तक यूरिया की मांग बढ़कर 38 एमएमटीपीए हो जाने की संभावना है। अत: देश में नई क्षमता वृद्धि के अभाव में यूरिया का आयात बढ़ाना पड़ेगा।

यही नहीं, डीओएफ ने अनुमान व्‍यक्‍त किया है कि यूरिया इकाइयों के संशोधित ऊर्जा मानकों की बदौलत अगले चार वर्षों के दौरान सब्सिडी मद में 6979 करोड़ रुपये की बचत होगी।