Revival of the Barauni and Gorakhpur Fertilizer Units

 

No: --- Dated: Mar, 31 2015

The Union Cabinet chaired by the Prime Minister, Shri Narendra Modi, today gave its approval for the revival of the closed unit of the Barauni of the Hindustan Fertilizer Corporation Ltd. (HFCL) and Gorakhpur Fertilizer Unit of Fertilizers Corporation India Limited. 

These units were lying defunct and were not in operation since 2004. Therefore, the units and other facilities were lying unutilized. It is important to mention here that there is no indigenous urea units in the Eastern part of the country except a small unit at Namrup - Assam. There has been no Greenfield or Brownfield urea unit in last 19 years. The total requirement of urea in the country is around 300 Lakh MetricTonne (LMT) out of which 220-230 LMT of urea is produced annually from the indigenous urea units and balance is being met from the international market at Western and Eastern Ports. The demand of urea of the Eastern region, at present is being met either from the Western ports or from the units located in Western and Central India involving long distance transportation. Long distance transportation of urea riddled with high expenditure in terms of high freight subsidy as well as logistics problems. The revival of these units will ensure timely availability of urea from these units to the eastern region. Apart from growth of the regional economy of the country, each unit will be revived through bidding route with an approximate investment of Rs. 5000 – 6000 crore, and create employment opportunity for 500 direct and 2500 indirect workers. 

This decision along with the CCEA’s decision today on gas pooling for the urea sector will enable these units to get gas at pooled price on their revival, making them globally competitive. 

 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज हिन्‍दुस्‍तान उर्वरक निगम लिमिटेड (एचएफसीएल) की बंद पड़ी बरौनी इकाई और उर्वरक निगम इंडिया लिमिटेड की बंद पड़ी गोरखपुर इकाई के पुनरुद्धार को मंजूरी दी। 

उपर्युक्‍त इकाइयां वर्ष 2004 से ही परिचालन में नहीं हैं। इस वजह से इन इकाइयों एवं अन्‍य सुविधाओं का इस्‍तेमाल नहीं हो पा रहा है। यहां पर इस बात का जिक्र करना महत्‍वपूर्ण है कि असम के नामरूप में स्‍थित एक छोटी इकाई को छोड़ देश के पूर्वी हिस्‍से में कोई भी स्‍वदेशी यूरिया इकाई नहीं है। पिछले 19 वर्षों में कोई नई यूरिया इकाई स्‍थापित नहीं की गई है। देश में यूरिया की कुल आवश्‍यकता तकरीबन 300 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) की है, जिसमें से 220-230 एलएमटी यूरिया का उत्‍पादन हर साल स्‍वदेशी यूरिया इकाइयों में होता है, जबकि शेष यूरिया की पूर्ति पश्‍चिमी एवं पूर्वी बंदरगाहों पर स्‍थित अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार से की जा रही है। पूर्वी क्षेत्र में यूरिया की मांग की पूर्ति मौजूदा समय में या तो पश्‍चिमी बंदरगाहों से अथवा पश्‍चिमी एवं मध्‍य भारत में स्‍थित इकाइयों से की जाती है, जिसके लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। हालांकि, लंबी दूरी तक यूरिया की ढुलाई करने पर कहीं ज्‍यादा खर्च आता है। यह खर्च भारी-भरकम भाड़ा सब्‍सिडी के चलते होता है और इसमें रसद (लॉजिस्‍टिक्‍स) की भी समस्‍याएं आती हैं। इन इकाइयों के पुनरुद्धार के फलस्‍वरूप पूर्वी भारत स्‍थित इन इकाइयों से समय पर यूरिया की आपूर्ति सुनिश्‍चित होगी। इसके साथ ही देश की क्षेत्रीय अर्थव्‍यवस्‍था का विकास भी सुनिश्‍चित होगा। हर इकाई का पुनरुद्धार निविदा प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा। इस पर तकरीबन 5000-6000 करोड़ रुपए का निवेश होगा और 500 लोगों को सीधे एवं 2500 लोगों को परोक्ष रूप से रोजगार के अवसर मिलेंगे। 

इस फैसले के साथ-साथ सीसीईए द्वारा आज ही यूरिया क्षेत्र के लिए गैस की पूलिंग पर लिए गए निर्णय से इन इकाइयों को पुनरुद्धार के बाद संयोजित (पूल्ड) कीमत पर गैस मिलेगी, जिससे वे वैश्‍विक स्‍तर पर प्रतिस्‍पर्धी बन जाएंगी।